ताड़ीखेत (अल्मोड़ा)। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन द्वारा रविवार को पेश किए गए केंद्रीय बजट 2026 को लेकर उत्तराखंड में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य त्रिभुवन फर्त्याल ने बजट को उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य के परिप्रेक्ष्य में निराशाजनक बताते हुए कहा कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार रविवार को पेश किया गया यह बजट आम जनमानस की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर सका।
त्रिभुवन फर्त्याल ने कहा कि उत्तराखंड राज्य लगभग 70 प्रतिशत वनाच्छादित है और पूरे उत्तर भारत के लिए “ऑक्सीजन सिलेंडर” की भूमिका निभा रहा है। इसके बावजूद प्रदेश द्वारा प्रतिवर्ष लगभग 94 हजार करोड़ रुपये मूल्य की वन आधारित सेवाएं राष्ट्र को प्रदान करने के बाद भी बहुप्रतीक्षित ग्रीन बोनस की मांग को बजट में पूरी तरह नजरअंदाज किया गया, जिससे प्रदेशवासियों में निराशा है।
उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों के सीमांत काश्तकारों की आय बढ़ाने, जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा, कृषि एवं उद्यान उपज के भंडारण और विपणन हेतु किसी ठोस बजट आधारित नीति या आधारभूत संरचना विकास की कोई रूपरेखा प्रस्तुत नहीं की गई।
पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य ने कहा कि उत्पादन वृद्धि के लिए उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति बढ़ाना आवश्यक है, लेकिन निम्न आय वर्ग, बेरोजगार कुशल एवं अकुशल युवाओं के लिए रोजगार सृजन को लेकर बजट में कोई स्पष्ट दिशा नहीं दिखाई देती। वहीं देश में सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थानों में कार्यरत लगभग 65 प्रतिशत दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन वृद्धि की जो उम्मीद थी, वह भी पूरी नहीं हो सकी।
छोटे व्यापारियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ई-कॉमर्स और अन्य कारणों से पहले से ही संकट झेल रहे छोटे दुकानदारों के वर्तमान और भविष्य को सुरक्षित करने के लिए कोई ठोस रोडमैप बजट में शामिल नहीं किया गया, जिससे उनमें रोष व्याप्त है।
त्रिभुवन फर्त्याल ने यह भी कहा कि उत्तराखंड की आर्थिकी मुख्य रूप से पर्यटन पर आधारित है, लेकिन पर्वतीय पर्यटन नगरी रानीखेत, नैनीताल और मसूरी जैसे शहरों में पर्यटकों के वाहनों की पार्किंग व्यवस्था के लिए किसी विशेष पैकेज की घोषणा नहीं की गई। इसके चलते पर्यटकों के साथ-साथ स्थानीय लोगों को भी यातायात जाम और आपात स्थितियों में भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब राज्य में “ट्रिपल इंजन सरकार” का दावा किया जा रहा है, केंद्रीय बजट में पर्वतीय राज्यों की अनदेखी से उत्तराखंड की जनता स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रही है।




















