पांच साल में 29 हजार करोड़ की कमी, राज्य के सामने नई आर्थिक चुनौती
29,167 करोड़ की कमी का अनुमान, सरकार के सामने संसाधन बढ़ाने की चुनौती
16वें वित्त आयोग का झटका: उत्तराखंड को पांच साल में करीब 20 हजार करोड़ की कमी का अंदेशा
देहरादून। उत्तराखंड को आगामी पांच वित्तीय वर्षों (2026-27 से 2030-31) में बड़ी वित्तीय चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। 16वां वित्त आयोग की सिफारिशों में राजस्व घाटा अनुदान और राज्य विशिष्ट अनुदान को समाप्त किए जाने से राज्य को भारी नुकसान का अनुमान है।
15वें वित्त आयोग से क्या मिला था?
15वां वित्त आयोग की अवधि (2021-26) में उत्तराखंड को राजस्व घाटा अनुदान के रूप में कुल 28,147 करोड़ रुपये प्राप्त हुए थे। वर्षवार यह राशि इस प्रकार रही—
2021-22: 7772 करोड़
2022-23: 7137 करोड़
2023-24: 6223 करोड़
2024-25: 4916 करोड़
2025-26: 2099 करोड़
इसके अतिरिक्त राज्य को स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए राज्य विशिष्ट अनुदान के रूप में 756 करोड़ रुपये मिले। दोनों को मिलाकर कुल 28,943 करोड़ रुपये की सहायता राज्य को प्राप्त हुई।
अब क्या बदलेगा?
16वें वित्त आयोग ने अपनी रिपोर्ट में किसी भी राज्य के लिए राजस्व घाटा अनुदान और राज्य विशिष्ट अनुदान की सिफारिश नहीं की है। इसकी सिफारिशें 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी होंगी और 2026 से 2031 तक लागू रहेंगी।
इसके अलावा आपदा प्रबंधन मद में भी राज्य को आगामी अवधि में 224 करोड़ रुपये कम मिलेंगे।
केंद्रीय करों में हिस्सेदारी से कुछ राहत
हालांकि आयोग ने केंद्रीय करों में उत्तराखंड की हिस्सेदारी में 0.02 प्रतिशत की वृद्धि की है। इससे 2026-27 में राज्य को लगभग 1841 करोड़ रुपये अतिरिक्त मिलेंगे। अनुमान है कि पांच वर्षों में इस मद में 9200 से 10 हजार करोड़ रुपये की अतिरिक्त प्राप्ति हो सकती है।
फिर भी 15वें वित्त आयोग की तुलना में कुल मिलाकर लगभग 29,167 करोड़ रुपये की राशि नहीं मिलेगी। केंद्रीय करों से मिलने वाली अतिरिक्त राशि घटाने के बाद भी राज्य को करीब 20 हजार करोड़ रुपये यानी औसतन 4000 करोड़ रुपये प्रति वर्ष की कमी का सामना करना पड़ सकता है।
आय बढ़ाने पर जोर
वित्त सचिव दिलीप जावलकर ने कहा कि 15वें वित्त आयोग के दौरान राज्य को बड़ी वित्तीय सहायता मिली थी, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। राज्य को अपने आंतरिक राजस्व स्रोत बढ़ाने होंगे, अन्यथा विकास कार्यों और गैर-विकास मदों के खर्चों को संतुलित करना चुनौतीपूर्ण होगा।
आगामी वर्षों में राज्य सरकार के सामने खर्चों की पूर्ति और विकास योजनाओं को गति देने के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाने की बड़ी परीक्षा




















