धामी सरकार के बजट पर सवाल: प्रवास, बेरोजगारी, आपदा और पर्यटन जैसे बड़े मुद्दों पर ठोस योजना का अभाव

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देहरादून। उत्तराखंड सरकार द्वारा वित्तीय वर्ष 2026–27 के लिए पेश किए गए बजट को लेकर कई अहम मुद्दों पर सवाल उठने लगे हैं। आलोचकों का कहना है कि राज्य की प्रमुख चुनौतियों—प्रवास, बेरोजगारी, आपदा प्रबंधन, पर्यटन और कृषि—पर जिस ठोस फोकस की उम्मीद थी, वह बजट में स्पष्ट रूप से नजर नहीं आया।

विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि पहाड़ी क्षेत्रों से तेजी से बढ़ रहे पलायन को रोकने के लिए अलग से विशेष पैकेज की जरूरत थी। पूर्व-बजट चर्चाओं में ग्रामीण आजीविका, जड़ी-बूटी खेती और स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देने के लिए ₹5,000 से ₹10,000 करोड़ तक का अलग फंड बनाए जाने की मांग उठी थी, लेकिन बजट में ऐसी कोई ठोस घोषणा नहीं की गई।

युवाओं की बढ़ती बेरोजगारी को देखते हुए भी बड़े रोजगार पैकेज की उम्मीद थी। कई संगठनों ने कम से कम 50 हजार नई सरकारी भर्तियों, स्टार्टअप फंड और स्किल डेवलपमेंट योजनाओं के विस्तार की मांग की थी। हालांकि बजट में युवा सशक्तिकरण का जिक्र जरूर है, लेकिन पर्यटन आधारित रोजगार या आईटी हब जैसे ठोस प्रावधान स्पष्ट नहीं हैं।

आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में भी बजट को लेकर निराशा जताई जा रही है। हाल के वर्षों में राज्य में बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाओं के बाद करीब ₹2,000 से ₹3,000 करोड़ के विशेष राहत कोष या जलवायु अनुकूल इंफ्रास्ट्रक्चर की उम्मीद थी, लेकिन बजट में ऐसा कोई विशेष प्रावधान सामने नहीं आया।

पर्यटन के क्षेत्र में भी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की घोषणा नहीं होने पर सवाल उठ रहे हैं। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए रोपवे, होमस्टे सब्सिडी और नई सुविधाओं के लिए लगभग ₹1,000 करोड़ के अतिरिक्त फंड की मांग की जा रही थी, जबकि बजट में इसका जिक्र सीमित नजर आया।

कृषि क्षेत्र में भी किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी, सब्सिडी बढ़ाने या जड़ी-बूटी और ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजनाओं की उम्मीद थी, लेकिन बजट में केवल सामान्य कृषि आवंटन ही दिखाई देता है।

इसके अलावा Nainital और Ranikhet जैसे पर्यटन नगरों में पर्यटकों और स्थानीय लोगों को जाम व पार्किंग की गंभीर समस्या से राहत दिलाने के लिए विशेष पैकेज की मांग भी पूरी नहीं हो पाई।

कुल मिलाकर कई जानकारों का मानना है कि यह बजट पर्वतीय राज्य की वास्तविक चुनौतियों के समाधान के बजाय अधिक चुनावी बजट जैसा प्रतीत होता है और कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में ठोस रोडमैप की कमी साफ दिखाई देती है।

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