चंपावत। नेपाल सीमा से लगे तल्लादेश क्षेत्र के बकोड़ा गांव में सड़क सुविधा नहीं होने के कारण ग्रामीण आज भी बेहद कठिन परिस्थितियों में जीवन जीने को मजबूर हैं।
गांव में किसी व्यक्ति के बीमार पड़ने या दुर्घटना में घायल होने पर उसे अस्पताल तक पहुंचाना किसी चुनौती से कम नहीं है। सड़क गांव तक नहीं पहुंचने के कारण मरीजों और घायलों को डोली, चारपाई या डंडे के सहारे कई किलोमीटर पैदल रास्ता तय कर मुख्य सड़क तक पहुंचाना पड़ता है।
शनिवार को भी ऐसा ही एक मामला सामने आया, जब मोस्टा ग्राम पंचायत के बकोड़ा गांव निवासी 80 वर्षीय दीवान सिंह के पैर में छह दिन पूर्व कांटा या शीशा चुभ गया था।
शुरुआत में मामूली चोट समझी गई, लेकिन समय बीतने के साथ पैर का दर्द बढ़ता गया। हालत बिगड़ने पर परिजनों और ग्रामीणों ने उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाने का निर्णय लिया।
गांव तक सड़क नहीं होने के कारण ग्रामीणों के सामने एक बार फिर वही पुरानी समस्या खड़ी हो गई। ग्रामीण रवींद्र रावत, जगदीश सिंह, प्रियांशु और केदार ने बारी-बारी से बुजुर्ग को डंडे में बांधकर अपने कंधों पर उठाया और करीब आठ किलोमीटर पैदल चलकर सीम गांव तक पहुंचाया। लगातार हो रही बारिश के कारण रास्ता बेहद जोखिम भरा था। कीचड़ और फिसलन के बीच बुजुर्ग को सुरक्षित सड़क तक पहुंचाना ग्रामीणों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था।
बुजुर्ग दीवान सिंह को मोस्टा से सीम गांव तक पहुंचाने में करीब दो घंटे का समय लगा। इसके बाद सीम गांव से जीप की मदद से उन्हें करीब 35 किलोमीटर दूर टनकपुर उपजिला चिकित्सालय ले जाया गया, जहां उनका उपचार कराया गया।
मरीजों को सड़क तक पहुंचाना बन गया रोजमर्रा की मजबूरी
ग्रामीणों का कहना है कि बकोड़ा गांव में यह कोई पहला मामला नहीं है। सड़क सुविधा के अभाव में यहां आए दिन बीमार और घायल लोगों को इसी तरह डोली अथवा कंधों के सहारे मुख्य सड़क तक पहुंचाया जाता है। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है।
ग्रामीणों के मुताबिक बरसात के दौरान पैदल रास्तों की स्थिति और खराब हो जाती है। ऐसे में मरीज को सड़क तक पहुंचाने में समय भी अधिक लगता है और दुर्घटना का खतरा भी बना रहता है। कई बार समय पर उपचार नहीं मिलने से मरीजों की परेशानी बढ़ने की आशंका बनी रहती है।
2012 में स्वीकृत हुई थी सड़क, अब तक धरातल पर नहीं उतर सका काम
बकोड़ा और आसपास के गांवों को सड़क सुविधा से जोड़ने के लिए मंच- मोस्टा-बकोड़ा सड़क वर्ष 2012 में स्वीकृत की गई थी। लेकिन वन विभाग से आवश्यक अनापत्ति (एनओसी) नहीं मिलने के कारण सड़क निर्माण का काम शुरू नहीं हो सका।
वर्ष 2025 में तत्कालीन जिलाधिकारी मनीष कुमार ने इस सड़क की डीपीआर तैयार करने और वन अनापत्ति से संबंधित पत्रावली के शीघ्र निस्तारण के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद अब तक सड़क निर्माण का काम धरातल पर शुरू नहीं हो पाया है। इससे ग्रामीणों में नाराजगी बनी हुई है।
500 से अधिक की आबादी को मिल सकता है सीधा लाभ
ग्राम प्रधान रवींद्र रावत का कहना है कि सड़क बनने से अकेड़ी, मोस्टा, ग्वानी और बकोड़ा गांवों की 500 से अधिक आबादी को सीधा लाभ मिलेगा। सड़क सुविधा के अभाव में ग्रामीणों को इलाज, शिक्षा, राशन और अन्य जरूरी कामों के लिए भी भारी परेशानी उठानी पड़ती है।
उन्होंने कहा कि सड़क के अभाव का असर गांव की आबादी पर भी पड़ रहा है और पलायन लगातार बढ़ रहा है। रोजगार और बेहतर सुविधाओं की तलाश में लोग गांव छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं।
ग्रामीणों ने सरकार और प्रशासन से मांग की है कि वर्षों से लंबित मंच-मोस्टा-बकोड़ा सड़क की वन संबंधी अड़चनों को दूर कर निर्माण कार्य जल्द शुरू कराया जाए, ताकि सीमावर्ती क्षेत्र के लोगों को सड़क और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए इस तरह संघर्ष न करना पड़े।








