उत्तराखंड में SIR प्रक्रिया सवालों के घेरे में, 45 सीटों पर हटाए गए वोटरों की संख्या 2022 की जीत के अंतर से ज़्यादा
मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्रों में बड़ी संख्या में आपत्तियों का दावा
70 में 45 विधानसभा सीटों पर जीत के अंतर से ज्यादा नाम हटाने की आपत्तियां; किच्छा में एक व्यक्ति ने 4855 आपत्तियां दर्ज कराईं, कांग्रेस ने चुनाव आयोग से जांच की मांग की
देहरादून। उत्तराखंड में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए बड़ी संख्या में आपत्तियां दर्ज होने के बाद अब इसकी पारदर्शिता और प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सामने आए विभिन्न विश्लेषणों में दावा किया गया है कि मुस्लिम आबादी वाले कुछ विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं के नाम हटाने की आपत्तियां अपेक्षाकृत अधिक संख्या में दर्ज की गई हैं।
सबर इंस्टीट्यूट के एक विश्लेषण के मुताबिक, उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों में से 45 सीटों पर मतदाता सूची से नाम हटाने की संख्या वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में संबंधित सीट पर जीत के अंतर से भी अधिक बताई गई है। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि बड़ी संख्या में आपत्तियां ऐसे लोगों की ओर से दाखिल की गई हैं, जिनके राजनीतिक दलों से जुड़े होने की जानकारी सामने आई है।
पांच विधानसभा क्षेत्रों में करीब 6500 आपत्तियों का दावा
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा से जुड़े बताए जा रहे पांच लोगों ने अलग-अलग पांच विधानसभा क्षेत्रों में करीब 6500 आपत्तियां दाखिल कर मतदाता सूची से नाम हटाने की मांग की। वहीं रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि राज्य में अब तक 262 आपत्तिकर्ताओं ने 10 से अधिक मतदाताओं के नाम हटाने के लिए आवेदन किए हैं।
एसआईआर के दौरान सबसे अधिक नाम हटाने की अर्जियों वाले जिलों में नैनीताल, ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार के नाम सामने आने का दावा किया गया है। इन जिलों में मुस्लिम आबादी भी उल्लेखनीय है। इसी वजह से विपक्षी दलों ने प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाते हुए चुनाव आयोग से पूरे मामले की जांच कराने की मांग की है।
किच्छा में 4857 आपत्तियां, एक व्यक्ति के नाम से 4855 आवेदन
ऊधमसिंह नगर जिले की किच्छा विधानसभा सीट का मामला विशेष रूप से चर्चा में है। रिपोर्ट के अनुसार यहां कुल 4857 आपत्तियां दर्ज की गई हैं, जिनमें से 4855 आपत्तियां अकेले राजेश तिवारी नामक व्यक्ति के नाम से दर्ज होने का दावा किया गया है। तिवारी को बूथ लेवल एजेंट के तौर पर काम करने वाला बताया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक इन आपत्तियों में बड़ी संख्या पहले से निर्धारित श्रेणी के तहत दर्ज आपत्तियों की है। किच्छा विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 28.4 प्रतिशत बताई गई है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के तिलक राज बेहड़ ने भाजपा के तत्कालीन विधायक राजेश शुक्ला को 10 हजार से अधिक मतों के अंतर से पराजित किया था।
गदरपुर में 670 आपत्तियां, भाजपा कार्यकर्ता पर आरोप
ऊधमसिंह नगर की ही गदरपुर विधानसभा सीट पर भी बड़ी संख्या में आपत्तियां दर्ज किए जाने का दावा सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार यहां 670 आपत्तियां दर्ज की गई हैं। इनमें सभी आपत्तियां भाजपा से जुड़े बताए जा रहे कार्यकर्ता चंकित हुरिया के नाम से दर्ज होने का दावा किया गया है।
गदरपुर सीट पर वर्ष 2022 में भाजपा ने करीब 1120 मतों के अंतर से जीत हासिल की थी। ऐसे में मतदाता सूची में नाम हटाने की बड़ी संख्या में आई आपत्तियों को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई है।
मुख्यमंत्री की सीट खटीमा में 392 आपत्तियां
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की विधानसभा सीट खटीमा भी एसआईआर से जुड़ी आपत्तियों के कारण चर्चा में है। रिपोर्ट के अनुसार यहां 392 आपत्तियां दर्ज की गई हैं और सभी आपत्तियां अमित कुमार पांडे नामक व्यक्ति के नाम से दर्ज होने का दावा किया गया है, जिन्हें भाजपा कार्यकर्ता बताया गया है।
खटीमा विधानसभा सीट राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। पुष्कर सिंह धामी ने 2012 और 2017 में यहां से जीत दर्ज की थी, लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी भुवन चंद्र कापड़ी से 6579 मतों के अंतर से चुनाव हार गए थे। इसके बाद चंपावत विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में धामी ने जीत दर्ज की थी।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भाजपा ने 2022 में हारी गई 23 विधानसभा सीटों पर माइक्रो मैनेजमेंट शुरू किया है, जिसमें खटीमा भी शामिल है। खटीमा में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब आठ प्रतिशत बताई गई है।
रुद्रपुर में 2818 आपत्तियां दर्ज होने का दावा
ऊधमसिंह नगर की रुद्रपुर विधानसभा सीट पर भी 2818 आपत्तियां दर्ज होने की बात सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार इनमें से सनी पासवान नामक व्यक्ति ने अकेले 230 मतदाताओं के नाम हटाने की मांग की। उनके सोशल मीडिया प्रोफाइल के आधार पर उन्हें भाजपा के अनुसूचित जाति मोर्चा का नगर महासचिव बताया गया है।
इन आंकड़ों के सामने आने के बाद विपक्ष ने सवाल उठाया है कि क्या एसआईआर प्रक्रिया के तहत आपत्तियां दर्ज कराने की व्यवस्था का इस्तेमाल राजनीतिक रूप से किसी खास वर्ग के मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है।
कांग्रेस ने चुनाव आयोग से जांच की मांग की
मुस्लिम आबादी वाले विधानसभा क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक संख्या में नाम हटाने की आपत्तियों के दावों के बाद कांग्रेस ने इस मुद्दे को चुनाव आयोग के समक्ष उठाया है। कांग्रेस का आरोप है कि एसआईआर प्रक्रिया का इस्तेमाल सोच-समझकर कुछ मतदाताओं को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है।
पार्टी ने आपत्तियों की जांच कराने के साथ-साथ यह भी मांग की है कि जिन लोगों ने बड़ी संख्या में नाम हटाने की अर्जियां दाखिल की हैं, उनके आवेदनों की निष्पक्ष तरीके से जांच की जाए।
कांग्रेस का कहना है कि सत्यापन के लिए सीमित समय, नाम और पते में त्रुटियां, मतदाताओं का एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरण तथा अन्य प्रक्रियागत या तकनीकी कारणों से बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम भी सूची से हट सकते हैं। पार्टी ने आशंका जताई है कि इसका असर विशेष रूप से उन क्षेत्रों में अधिक पड़ सकता है जहां अल्पसंख्यक मतदाताओं की संख्या अधिक है।
10 से ज्यादा आपत्तियों पर भी उठे सवाल
चुनाव आयोग के 2023 के मैनुअल का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि एक व्यक्ति द्वारा एक दिन में 10 से अधिक आपत्तियां दर्ज नहीं कराई जा सकतीं। इसके बावजूद उत्तराखंड में कुछ व्यक्तियों द्वारा सैकड़ों और हजारों आपत्तियां दर्ज कराए जाने का दावा किया गया है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि रिपोर्ट के मुताबिक एसआईआर प्रक्रिया के दौरान उत्तराखंड की मतदाता सूची में कुल मतदाताओं की संख्या करीब 79.6 लाख से घटकर 71.3 लाख रह गई है। यानी लगभग 8.3 लाख नामों की कमी दर्ज होने का दावा किया जा रहा है।
हालांकि, मतदाता सूची में कमी का मतलब यह जरूरी नहीं है कि सभी नाम राजनीतिक कारणों से हटाए गए हैं। एसआईआर के दौरान मृत मतदाताओं, स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाताओं, दोहरे पंजीकरण और अन्य पात्रता संबंधी कारणों से भी नाम हटाए जा सकते हैं। इसलिए अंतिम निष्कर्ष के लिए चुनाव आयोग द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों और सत्यापन प्रक्रिया के परिणाम महत्वपूर्ण होंगे।
8 जून से शुरू हुई प्रक्रिया, 15 सितंबर को आएगी अंतिम सूची
उत्तराखंड में वर्ष 2026 के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया 8 जून से शुरू हुई थी। प्रक्रिया पूरी होने के बाद 15 सितंबर 2026 को अंतिम मतदाता सूची जारी किए जाने का कार्यक्रम बताया गया है।
ऐसे में अंतिम सूची जारी होने से पहले बड़ी संख्या में दर्ज आपत्तियों, उनके आधार, सत्यापन की प्रक्रिया और हटाए जाने वाले नामों को लेकर राजनीतिक तथा सामाजिक स्तर पर बहस जारी रहने की संभावना है। अब निगाहें चुनाव आयोग की जांच, दावों-आपत्तियों के निस्तारण और अंतिम मतदाता सूची पर टिकी हैं।








