भारतीय भाषाओं के संवर्धन में संस्कृत का योगदान महत्वपूर्ण : राज्यस्तरीय ऑनलाइन संगोष्ठी में वक्ताओं ने रखे विचार

संस्कृत मास महोत्सव के तहत ऊधमसिंह नगर जनपद ने आयोजित की ई-संगोष्ठी, देश के विभिन्न राज्यों से जुड़े प्रतिभागी

ऊधमसिंह नगर। उत्तराखण्ड-संस्कृत-संस्थानम्, हरिद्वार की ओर से संस्कृत मास महोत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित की जा रही राज्यस्तरीय अन्तर्जालीय संस्कृत संगोष्ठी की श्रृंखला में रविवार, 20 सितंबर 2026 को जनपद ऊधमसिंह नगर द्वारा ‘भारतीय-भाषाणां संवर्धनाय संस्कृतस्य योगदानम्’ विषय पर ऑनलाइन संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य संस्कृत भाषा का व्यापक प्रचार-प्रसार करना तथा भारतीय भाषाओं के संवर्धन में संस्कृत के योगदान और महत्त्व को जनमानस के समक्ष प्रस्तुत करना रहा।

संगोष्ठी में उत्तराखण्ड-संस्कृत-संस्थानम्, हरिद्वार के सचिव प्रो. विनय कुमार विद्यालंकार ने विषय से संबंधित विस्तृत व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण के लिए संस्थान द्वारा किए जा रहे विभिन्न कार्यों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि संस्कृत भारतीय ज्ञान परंपरा की महत्वपूर्ण भाषा है और इसके अध्ययन-अध्यापन को व्यापक स्तर पर बढ़ावा देने की आवश्यकता है।

कार्यक्रम के अध्यक्ष एवं राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार डॉ. कीर्तिवल्लभ शक्टा ने संस्कृत के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संस्कृत को भारतीय भाषाओं की जननी के रूप में देखा जाता है और भारतीय भाषायी परंपरा के विकास में इसका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने संस्कृत के संरक्षण और संवर्धन को भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से भी जोड़ा।

मुख्य अतिथि उत्तरप्रदेश-संस्कृत-संस्थानम् के भूतपूर्व अध्यक्ष आचार्य वाचस्पति मिश्र ने अपने संबोधन में “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” का उल्लेख करते हुए संस्कृत भाषा की महत्ता पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि संस्कृत की परंपरा, अखंडता और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखना आवश्यक है। उनके अनुसार संस्कृत भारतीय ज्ञान, साहित्य और संस्कृति की समृद्ध परंपरा से जुड़ी भाषा है।

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता प्रत्नकीर्ति प्राच्य शोध संस्थानम्, वाराणसी के सचिव आचार्य प्रताप कुमार मिश्र ने गढ़वाली, कुमाऊनी, भोजपुरी, बंगला, नेपाली सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं में संस्कृत के प्रभाव पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं को व्याकरण और शब्दावली की दृष्टि से देखने पर उनमें संस्कृतनिष्ठता के अनेक उदाहरण दिखाई देते हैं। उन्होंने भारतीय भाषाओं के विकास और परस्पर संबंधों के अध्ययन में संस्कृत की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।

सहवक्ता एवं असिस्टेंट प्रोफेसर व्याकरण डॉ. श्रीओम शर्मा ने संस्कृत और भारतीय भाषाओं के संबंध पर अपने विचार रखते हुए महाभाष्यकार महर्षि पतंजलि के संदर्भ का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि संस्कृत के अध्ययन से भाषा, व्याकरण और भारतीय शास्त्रीय परंपरा को समझने में सहायता मिलती है। उन्होंने संस्कृत भाषा के अध्ययन को आवश्यक बताते हुए इसके संरक्षण और प्रचार-प्रसार पर बल दिया।

विशिष्ट अतिथि हंसराज महाविद्यालय, नई दिल्ली की सहायकाचार्या डॉ. खुशबू शुक्ला ने “संस्कृतं नाम दैवी वाक् अन्वाख्याता महर्षिभिः” का उल्लेख करते हुए संस्कृत भाषा की प्राचीनता और विशिष्टता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संस्कृत भारतीय चिंतन और ज्ञान परंपरा की महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति रही है।

कार्यक्रम का सफल संचालन संस्कृत विभागाध्यक्ष, राजकीय महाविद्यालय तल्ला सल्ट, अल्मोड़ा एवं जनपद संयोजक डॉ. राघव कुमार झा ने किया। ऑनलाइन माध्यम से आयोजित ई-संगोष्ठी की संपूर्ण तकनीकी व्यवस्था सहायकाचार्य संस्कृत, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय कर्णप्रयाग, चमोली एवं जनपद सहसंयोजक डॉ. अंकित मनोड़ी द्वारा संपादित की गई। उन्होंने अंत में सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया।

संगोष्ठी में उत्तराखण्ड, राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों से प्रतिभागियों ने ऑनलाइन माध्यम से सहभागिता की।

कार्यक्रम के दौरान संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार, भारतीय भाषाओं के संरक्षण तथा संस्कृत की समृद्ध ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया गया।

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