रानीखेत की 129 साल पुरानी रामलीला परंपरा में बड़ा बदलाव, बदहाल सड़कों के चलते इस बार नहीं निकली रावण-कुंभकर्ण और मेघनाद की शोभायात्रा

रानीखेत में 129 साल की परंपरा में पहली बार बदलाव, खराब सड़कों के कारण मुख्य बाजार से नहीं निकली रावण कुंभकर्ण व मेघनाद की शोभायात्रा

रिपोर्ट– बलवन्त सिंह रावत 

रानीखेत। उत्तराखंड की ऐतिहासिक नगरी रानीखेत में 129 वर्षों से लगातार चली आ रही रामलीला की परंपरा में इस वर्ष एक बड़ा बदलाव देखने को मिला।

शहर की बदहाल सड़कों और जगह-जगह बने गहरे गड्ढों के चलते रामलीला कमेटी ने इस बार रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों की पारंपरिक शोभायात्रा मुख्य बाजार से नहीं निकालने का निर्णय लिया ।

हालांकि, दशहरा पर्व पर पुतला दहन का मुख्य कार्यक्रम पूर्व निर्धारित समय के अनुसार रात आठ बजे सीतापुर मैदान में आयोजित किया जाएगा। इस फैसले के बाद शहर में सड़कों की स्थिति और ऐतिहासिक परंपरा में आए बदलाव को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

रानीखेत की ऐतिहासिक रामलीला केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक पहचान और वर्षों पुरानी परंपरा का भी प्रतीक है।

पिछले 129 वर्षों से यहां दशहरे के अवसर पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती रही है।

यह शोभायात्रा खड़ी बाजार, रोडवेज स्टेशन और जरूरी बाजार सहित शहर के प्रमुख मार्गों से होकर सीतापुर मैदान पहुंचती थी। इसके बाद परंपरागत रूप से तीनों पुतलों का दहन किया जाता था।

लेकिन इस बार शहर की सड़कों की खराब स्थिति के चलते रामलीला कमेटी को अपनी इस परंपरा में बदलाव करना पड़ा ।

मुख्य मार्गों पर जगह-जगह गड्ढे होने और आवागमन में परेशानी की आशंका को देखते हुए समिति ने सुरक्षा और आम जनता की सुविधा को प्राथमिकता देते हुए शोभायात्रा को शहर के भीतर नहीं निकालने का निर्णय लिया है।

रामलीला कमेटी के सचिव विनीत चौरसिया ने बताया कि हर वर्ष रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों की शोभायात्रा शहर के प्रमुख बाजारों से होकर सीतापुर मैदान पहुंचती थी। लेकिन इस बार सड़कों की बदहाल स्थिति को देखते हुए समिति ने यह फैसला लिया है, ताकि शोभायात्रा के दौरान किसी तरह की परेशानी या दुर्घटना की आशंका से बचा जा सके।

गौरतलब है कि 129 वर्षों की रामलीला परंपरा में यह पहला अवसर बताया जा रहा है, जब रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों की शोभायात्रा मुख्य बाजार के रास्तों से होकर नहीं गुजरी।

इससे ऐतिहासिक परंपरा के इस महत्वपूर्ण हिस्से में बदलाव आया है।

वहीं, इस निर्णय के बाद स्थानीय लोगों के बीच शहर की सड़कों की बदहाली को लेकर चर्चा हो रही है। लोगों के लिए यह बदलाव जहां एक ओर सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, वहीं दूसरी ओर यह शहर की बुनियादी सुविधाओं पर भी सवाल खड़े करता है।

फिलहाल, दशहरा पर्व पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन रात आठ बजे सीतापुर मैदान में किया गया।

अब सभी की निगाहें इस आयोजन पर टिकी हैं, जहां पारंपरिक शोभायात्रा के बिना ही बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक दशहरा पर्व मनाया गया।

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