स्व. हीरा सिंह राणा की 84वीं जयंती पर डढोली में गूंजे कालजयी गीत, राजकीय सांस्कृतिक दिवस घोषित करने की उठी मांग

कुमाऊंनी लोकगायक हीरा सिंह राणा की 84वीं जयंती पर पैतृक गांव डढोली में उमड़ा जनसैलाब।

कुमाऊंनी संस्कृति के संवाहक सुर सम्राट को श्रद्धांजलि देने उमड़ा जनसैलाब, संग्रहालय भवन की गुणवत्ता और प्रतिमा को लेकर भी उठे सवाल

रिपोर्टर — बलवन्त सिंह रावत

रानीखेत/सल्ट। कुमाऊंनी संस्कृति, लोकभाषा और जनभावनाओं को अपनी रचनाओं और सुरों के माध्यम से देश-दुनिया तक पहुंचाने वाले लोकगायक एवं जनकवि स्व. हीरा सिंह राणा की 84वीं जयंती उनके पैतृक गांव डढोली में धूमधाम और भावपूर्ण माहौल में मनाई गई। इस अवसर पर क्षेत्र के बड़ी संख्या में लोगों ने समारोह में पहुंचकर राणा जी को श्रद्धासुमन अर्पित किए और उनके गीतों एवं सांस्कृतिक योगदान को याद किया।
एडवोकेट जीएस चौहान की अध्यक्षता में आयोजित समारोह में ब्लॉक प्रमुख सल्ट कंचन रावत और कैप्टन केएस भाकुनी मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे। विशिष्ट अतिथियों में वीरेंद्र सिंह बंगारी, भैरव दत्त पांडे, मान सिंह बिष्ट, सुनील टम्टा, महेश उपाध्याय, तुला सिंह तड़ियाल, मदन कठायत, सूबेदार हीरा सिंह और छोटू प्रधान शामिल रहे। कार्यक्रम की शुरुआत राणा जी की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि देने के साथ हुई।
इसके बाद एडवोकेट जीएस चौहान, कुंदन सिंह बिष्ट, कंचन रावत, महेश उपाध्याय, तुला सिंह तड़ियाल और मदन कठायत ने सभा को संबोधित किया। वक्ताओं ने कहा कि हीरा सिंह राणा ने अपने गीतों के माध्यम से पहाड़ की प्रकृति, लोकजीवन, संघर्ष, सामाजिक सरोकारों और जनभावनाओं को आवाज दी। उनकी रचनाएं आज भी लोगों के बीच उतनी ही लोकप्रिय हैं और नई पीढ़ी को अपनी लोकसंस्कृति से जोड़ने का काम कर रही हैं।
जन-जागरण के प्रतीक थे हीरा सिंह राणा
समारोह में वक्ताओं ने कहा कि राणा जी केवल मनोरंजन के लिए गीत लिखने वाले कलाकार नहीं थे, बल्कि सच्चे प्रकृति प्रेमी और जन-जागरण के प्रतीक थे। उनकी रचनाओं में पहाड़ के आम आदमी की पीड़ा, संघर्ष और अधिकारों की आवाज स्पष्ट दिखाई देती है। ‘लस्का कमर बांधा हिम्मत का साथा’ जैसे गीतों ने लोगों को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने और सामाजिक चेतना के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
वक्ताओं ने कहा कि हीरा सिंह राणा का योगदान केवल कुमाऊंनी लोकसंगीत तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से उत्तराखंड की लोकभाषा और संस्कृति को व्यापक पहचान दिलाई। दिल्ली सरकार द्वारा उन्हें ‘गढ़वाली, कुमाऊंनी व जौनसारी भाषा अकादमी’ का उपाध्यक्ष बनाकर सम्मान दिए जाने का उल्लेख करते हुए वक्ताओं ने कहा कि इस तरह का सम्मान उनके अपने गृह राज्य उत्तराखंड में भी मिलना चाहिए था।
जन्मदिन को सांस्कृतिक दिवस घोषित करने की मांग
समारोह में क्षेत्रीय जनता ने उत्तराखंड सरकार से मांग उठाई कि स्व. हीरा सिंह राणा की जयंती को प्रदेश में राजकीय ‘सांस्कृतिक दिवस’ के रूप में घोषित किया जाए। लोगों का कहना था कि इससे पहाड़ की लोकभाषा, लोकसंगीत और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षण देने के प्रयासों को मजबूती मिलेगी तथा आने वाली पीढ़ियों को राणा जी के योगदान से परिचित कराया जा सकेगा।
राणा जी के गीतों से सराबोर हुआ डढोली
जयंती समारोह में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया गया। विभिन्न कलाकारों ने हीरा सिंह राणा के कालजयी गीतों की मनमोहक प्रस्तुतियां देकर माहौल को संगीतमय बना दिया। दिल्ली से पहुंचे रंगमंच कलाकार महेश उपाध्याय, ईश्वर चंद्र और चंद्रशेखर गहतोड़ी ने अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से दर्शकों का मन मोह लिया। राणा जी के गीतों की प्रस्तुतियों के दौरान पूरा माहौल उनकी स्मृतियों और लोकसंस्कृति के रंग में रंग गया।
संग्रहालय भवन की गुणवत्ता पर उठे सवाल
समारोह के दौरान स्व. हीरा सिंह राणा की स्मृतियों को संरक्षित करने के लिए बनाए गए संग्रहालय भवन को लेकर भी जनता ने सवाल उठाए। ग्रामीणों के अनुसार लाखों रुपये की लागत से निर्मित संग्रहालय भवन की छत हस्तांतरण से पहले ही टपकने लगी है। भवन के भीतर रैक तो बनाए गए हैं, लेकिन उनमें शीशे के कवर नहीं लगाए गए हैं। इसके कारण राणा जी से जुड़े महत्वपूर्ण स्मृति चिन्ह धूल फांक रहे हैं।
जनता ने संग्रहालय भवन के निर्माण की उच्चस्तरीय जांच कराए जाने की मांग की है। लोगों का कहना है कि राणा जी जैसी महान लोकविभूति की स्मृतियों को सुरक्षित रखने के लिए बनाए गए भवन की गुणवत्ता और रखरखाव पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
राणा जी की प्रतिमा को लेकर भी नाराजगी
समारोह में राणा जी की प्रतिमा को लेकर भी ग्रामीणों ने असंतोष जताया। उनका कहना है कि विभाग द्वारा स्थापित की गई प्रतिमा स्व. हीरा सिंह राणा के वास्तविक स्वरूप से मेल नहीं खाती। ग्रामीणों ने मांग की कि वर्तमान प्रतिमा को हटाकर उनके वास्तविक स्वरूप के अनुरूप नई प्रतिमा स्थापित की जाए, ताकि पैतृक गांव में आने वाले लोग उन्हें सही रूप में श्रद्धांजलि दे सकें।
समारोह में मौजूद लोगों ने कहा कि हीरा सिंह राणा की स्मृतियों और उनकी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना केवल उनके गांव या क्षेत्र की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड की साझा जिम्मेदारी है। कार्यक्रम का संचालन खीम सिंह बंगारी ने किया।

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