हल्द्वानी। पहाड़ी संस्कृति,बोली भाषा रहन-सहन लोकगीत, लोक देवता लोक परंपरा, लोक भाषा के लिए जन जागरूकता रैली का आयोजन किया गया।
आयोजनकर्ता पहाड़ी आर्मी के संस्थापक अध्यक्ष हरीश रावत ने मीडिया को कहा कि लगातार पहाड़ की संस्कृति विलुप्त हो रही है।
जिससे नवयुवाओ को अपनी संस्कृति से जोड़ने के लिए यह पथ संचलन कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है।
कार्यक्रम का उद्देश्य अपने बुजुर्गों के द्वारा बनाई गई परंपराओं का पालन, पहाड़ के लोक देवता,लोक नृत्य, लोक कला के विषय में अपने समाज बताना है ।
उन्होंने कहा कल होने वाली इस नगर पथ संचलन कार्यक्रम में पहाड़ी समाज के हजारों की संख्या में लोग मौजूद रहेl बुजुर्गों ने, युवाओं ने , महिलाओं ने, बच्चों ने, इस जन जागरूकता रैली में शामिल होकर अपनी संस्कृति अपनी पहचान को जन जन तक पहुंचाने में अपना योगदान दिया।
गोलू देवता मंदिर, हीरा नगर से शगुन- आखर गाते हुए शुरू होकर जेल रोड, कालूशाही मंदिर होते हुए रोड वेज, नैनीताल रोड में डी डी पंत पार्क में समापन हुआl सभी लोगों के हातों में अपने त्योहार, अपनी कला, अपने ईष्ट देवता, अपनी देवियाँ, अपनी शैली आदि कि तख्तियां मौजूद थीं।
पहाडी आर्मी उत्तराखंड के गेरुआ झंडे, पहाडी हिंदू सशक्तिकरण अभियान के साथ लहरा रहे थे।
सभी पुरुषों के सर में पहाड की परंपरानुसार सफेद टोपी और हातों में लाठी थीl
महिलाओँ ने अपनी परंपरागत पहाडी शैली में कपड़े, सर में स्कार्फ, कमर में रस्सी, कमर में फंसी हुई दरांती, पहाड़ी आभुषण आदि मुख्य आकर्षण थे।
माता जीया रानी और रानी कर्णावती मुख्य आकर्षण का केंद्र थे, बच्चियों ने पहाड की वीर नारियों की वीरता को दिखाया था।
पहाडी आर्मी के संस्थापक अध्यक्ष हरीश रावत ने कहा कि अपनी परम्परा, कला और शैली का हमेशा सम्मान करना चाहिएl बाहर की संस्कृति का अतिक्रमण लगातार बढ़ता जा रहा है।
इस समाज की भाषा संस्कृत के विलुप्त हो जाती है वह सामाजिक विलुप्त हो जाता है.
पहाडी आर्मी उत्तराखंड के जिला प्रभारी महिला दीपा पांडे और जिला अध्यक्ष प्रेमा मेऱ ने कहा कि अपनी संस्कृति और सभ्यता को सँजो कर रखना हमारे लिए गर्व का विषय है।
आज पहाड की संस्कृति, परंपरा को घर घर तक पहुँचाना हमारी जिम्मेदारी है और आज हमने प्रयास किया है।
पहाडी पथ संचलन का नेतृत्व पहाड़ी आर्मी उत्तराखंड के जिला अध्यक्ष राजेंद्र कांडपाल जी के नेतृत्व में हुआ।
पथ संचलन के दौरान हरेन्द्र राणा, गीता बिष्ट, बसंत सिंह, हरेंद्र सिंह राणा, मोहन सिंह बोरा, नीला बिष्ट, जया, अंजलि, दीपा, मंजू, गीता, प्रीति, हनी, तारा, कविता, गीता चंदोला, करिश्मा, हेमंती, खीम सिंह, गोविन्द, बिपिन चंद, मीरा, मीरा, पुष्पा, हार्दिक, आशू, आदित्य जीना, अन्वी, आर्वी, मानवी कृतिका, सोना, देव, जुही, गीतांजलि आदि सैकड़ों की संख्या में पहाडी मौजूद रहे।




















