ग्रामीण क्षेत्रों में विज्ञान लोकप्रियकरण: रानीखेत की जीवंत कहानियाँ एक प्रेरक उदाहरण

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ग्रामीण क्षेत्रों में विज्ञान लोकप्रियकरण: रानीखेत की जीवंत कहानियाँ एक प्रेरक उदाहरण

लेखक:

डॉ. भारत पांडेय

समन्वयक, विज्ञान लोकप्रियीकरण समिति

राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रानीखेत

उत्तराखंड के शांत, सुरम्य और हरियाली से आच्छादित पहाड़ों के बीच बसे छोटे-छोटे गाँवों में जीवन अपनी सहज गति से चलता है। सुबह की पहली किरण के साथ खेतों की ओर जाते लोग, दूर तक फैली पर्वत श्रृंखलाएँ और प्रकृति की गोद में पलता हुआ सरल जीवन—यह सब कुछ मन को शांति देता है। किन्तु इस सुंदरता के बीच एक वास्तविकता भी है—विज्ञान और वैज्ञानिक सोच की रोशनी अभी भी हर घर तक समान रूप से नहीं पहुँच पाई है।

यहीं से विज्ञान लोकप्रियकरण की वह यात्रा आरम्भ होती है, जो केवल ज्ञान देने की नहीं, बल्कि सोच को बदलने की प्रक्रिया है। विज्ञान हमें केवल यह नहीं बताता कि चीजें कैसे होती हैं, बल्कि यह भी सिखाता है कि हम प्रश्न कैसे करें, तर्क कैसे करें और सत्य तक कैसे पहुँचें। यही जिज्ञासा किसी भी परिवर्तन की पहली चिंगारी होती है।

राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रानीखेत में विज्ञान लोकप्रियीकरण समिति द्वारा किए गए प्रयास इसी चिंगारी को प्रज्वलित करने का एक सतत प्रयास रहे हैं। यहाँ विज्ञान को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रखकर, उसे अनुभव, संवाद और प्रेरणा के माध्यम से छात्रों के जीवन का हिस्सा बनाया गया।

मुझे आज भी वह क्षण अत्यंत स्पष्ट रूप से स्मरण है, जब हमारे महाविद्यालय की छात्राएँ—ज्योति और तनिषा—पहली बार उत्तराखंड विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी कांग्रेस के मंच पर अपने शोध को प्रस्तुत करने के लिए पहुँचीं। पहाड़ों की पगडंडियों से चलकर एक बड़े मंच तक पहुँचना उनके लिए किसी स्वप्न के साकार होने जैसा था। मंच पर खड़ी वे दोनों छात्राएँ केवल अपने शोध का प्रस्तुतीकरण नहीं कर रही थीं, बल्कि अपने साथ उस पूरे ग्रामीण समाज की आशाएँ और सपने लेकर आई थीं।

उनके चेहरे पर हल्की घबराहट थी, परन्तु आँखों में एक अद्भुत आत्मविश्वास भी झलक रहा था। जैसे ही उन्होंने अपने विचारों को स्पष्ट और दृढ़ स्वर में प्रस्तुत किया, यह अनुभव हुआ कि प्रतिभा किसी स्थान की मोहताज नहीं होती। उस दिन केवल दो छात्राएँ नहीं बोलीं, बल्कि पहाड़ की हर बेटी की आवाज़ उस मंच पर गूँज उठी।

यह कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।

इन्हीं प्रयासों की निरंतरता में, महाविद्यालय की पाँच छात्राओं ने “शे फ़ॉर स्टेम” पहल के अंतर्गत उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए उन्नत प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए चयन प्राप्त किया। यह उपलब्धि केवल एक चयन नहीं थी, बल्कि यह इस बात का प्रमाण थी कि यदि ग्रामीण क्षेत्रों की बेटियों को सही मार्गदर्शन और अवसर मिलें, तो वे विज्ञान और नवाचार के क्षेत्र में नई ऊँचाइयाँ छू सकती हैं।

जब इन छात्राओं को अपने चयन का समाचार मिला, तो वह क्षण केवल उनके लिए ही नहीं, बल्कि पूरे महाविद्यालय और क्षेत्र के लिए गर्व और प्रसन्नता का अवसर बन गया। यह उन सभी बेटियों के लिए एक प्रेरणा बन गया, जो अब तक अपने सपनों को सीमित समझती थीं। अब उन्हें यह विश्वास होने लगा कि वे भी अपने परिश्रम और जिज्ञासा के बल पर आगे बढ़ सकती हैं।

इसी क्रम में, महाविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय स्तर के वैज्ञानिकों और नोबेल पुरस्कार प्राप्त विद्वानों से संवाद का अवसर भी छात्रों को मिला। पहाड़ों में रहने वाले इन छात्रों के लिए यह अनुभव किसी नए संसार के द्वार खुलने जैसा था।

एक छात्र ने भावुक होकर कहा—

“सर, अब लगता है कि हम भी बहुत आगे तक जा सकते हैं।”

यह केवल एक वाक्य नहीं था, बल्कि यह उस आत्मविश्वास की अभिव्यक्ति थी, जो विज्ञान के माध्यम से उनके भीतर जाग चुका था।

धीरे-धीरे यह परिवर्तन स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा। जो छात्र पहले विज्ञान को कठिन और दूर का विषय मानते थे, अब वही छात्र जिज्ञासा के साथ प्रश्न पूछने लगे, प्रयोगों में रुचि लेने लगे और अपने आसपास की दुनिया को समझने का प्रयास करने लगे।

विज्ञान अब उनके लिए केवल एक विषय नहीं रहा, बल्कि एक दृष्टिकोण बन गया—जीवन को देखने का एक नया तरीका। उन्होंने अपने आसपास की समस्याओं को समझने और उनके समाधान खोजने में विज्ञान की सहायता लेना प्रारम्भ किया। स्वास्थ्य, पर्यावरण, खेती और दैनिक जीवन की छोटी-छोटी बातों में भी वैज्ञानिक सोच का प्रभाव दिखाई देने लगा।

रानीखेत की ये कहानियाँ केवल घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि यह इस बात का सजीव प्रमाण हैं कि विज्ञान लोकप्रियकरण यदि संवेदनशीलता, सरलता और समर्पण के साथ किया जाए, तो यह दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में भी परिवर्तन की एक सशक्त धारा बन सकता है।

यह यात्रा अभी प्रारम्भ है, परन्तु इसकी दिशा स्पष्ट है—जिज्ञासा से ज्ञान तक, ज्ञान से आत्मविश्वास तक और आत्मविश्वास से उपलब्धि तक।

आज आवश्यकता है कि विज्ञान लोकप्रियकरण को एक अभियान के रूप में अपनाया जाए, जो हर गाँव, हर घर और हर छात्र तक पहुँचे। क्योंकि जब पहाड़ों की नीरवता में जिज्ञासा की एक छोटी सी चिंगारी जलती है, तो वह केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समाज के भविष्य को प्रकाशित कर देती है।

“विज्ञान की वास्तविक शक्ति तब प्रकट होती है, जब वह दूरस्थ गाँवों में नई सोच, नए सपनों और आत्मविश्वास की ज्योति जलाती है।”

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