रानीखेत महाविद्यालय में ‘गढ़ भोज’ कार्यक्रम का आयोजन, स्थानीय थाली को वैश्विक बाजार से जोड़ने पर जोर

राजकीय महाविद्यालय रानीखेत में ‘गढ़ भोज’ का आयोजन।

मंडुवे की रोटी, झंगोरे की खीर और भट्ट की चुड़कानी समेत पारंपरिक व्यंजनों ने बिखेरी पहाड़ी संस्कृति की खुशबू; विद्यार्थियों ने लिया ‘सप्ताह में एक दिन, एक स्थानीय अनाज’ अपनाने का संकल्प

रिपोर्ट– बलवन्त सिंह रावत 

रानीखेत। उत्तराखंड शासन के उच्च शिक्षा विभाग के निर्देशानुसार मोटे अनाज (श्री अन्न) एवं स्थानीय खाद्य संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से राजकीय महाविद्यालय रानीखेत में गृह विज्ञान विभाग की ओर से ‘गढ़ भोज’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य विषय “स्थानीय थाली से वैश्विक बाजार तक” रखा गया। कार्यक्रम में पारंपरिक पहाड़ी व्यंजनों के प्रदर्शन के साथ-साथ स्थानीय खाद्य पदार्थों के संरक्षण, पोषण, ब्रांडिंग, पैकेजिंग, विपणन और उद्यमिता से जुड़ी संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की गई।

कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. पुष्पेश कुमार पांडे ने की। उन्होंने कहा कि ‘गढ़ भोज’ महज पारंपरिक व्यंजनों के प्रदर्शन तक सीमित कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह स्थानीय संस्कृति, परंपरा, पोषण और आत्मनिर्भरता को समझने तथा नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के मोटे अनाज और पारंपरिक खाद्य पदार्थ पोषण की दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार के क्षेत्र में भी व्यापक संभावनाएं रखते हैं।

प्राचार्य ने कहा कि यदि स्थानीय उत्पादों को आधुनिक तकनीक, बेहतर पैकेजिंग, प्रभावी ब्रांडिंग और उचित बाजार उपलब्ध कराया जाए तो इन्हें राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाई जा सकती है। उन्होंने कहा कि महाविद्यालय का प्रयास है कि विद्यार्थी अपनी स्थानीय विरासत को केवल संरक्षित करने तक सीमित न रहें, बल्कि उसे उद्यमिता, नवाचार और आत्मनिर्भरता से जोड़कर आगे बढ़ाएं।

कार्यक्रम के दौरान विभिन्न विभागों के प्राध्यापकों और विद्यार्थियों ने स्थानीय खाद्य पदार्थों के संरक्षण, संवर्धन, ब्रांडिंग तथा वैश्विक बाजार में उनकी संभावनाओं पर विचार रखे। वाणिज्य विभाग से प्रो. पी.एन. तिवारी एवं डॉ. संतोष कुमार ने स्थानीय खाद्य उत्पादों के व्यावसायिक पक्ष पर चर्चा की। डॉ. संतोष कुमार ने विशेष रूप से श्री अन्न की प्रभावी ब्रांडिंग, आकर्षक पैकेजिंग और बेहतर विपणन रणनीति के माध्यम से स्थानीय उत्पादों को व्यापक बाजार तक पहुंचाने की संभावनाओं पर प्रकाश डाला।

राजनीति विज्ञान विभाग से डॉ. धीरज सिंह खाती, डॉ. पूजा एवं डॉ. बी.के. जोशी ने स्थानीय खाद्य संस्कृति, आत्मनिर्भरता और इसके सामाजिक-आर्थिक महत्व पर विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि स्थानीय खाद्य परंपराएं किसी क्षेत्र की सामाजिक संरचना, जीवनशैली और आर्थिक गतिविधियों से गहराई से जुड़ी होती हैं।

वहीं अंग्रेजी विभाग से निर्णायक की भूमिका में उपस्थित डॉ. बरखा रौतेला एवं डॉ. निधि पांडे ने कहा कि साहित्य, लोककथाओं, स्थानीय आख्यानों और स्टोरी-टेलिंग के माध्यम से उत्तराखंड की पारंपरिक थाली को वैश्विक स्तर पर विशिष्ट पहचान दिलाई जा सकती है। उन्होंने कहा कि किसी स्थानीय खाद्य पदार्थ की कहानी, उसकी संस्कृति और परंपरा को प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करना उसके ब्रांड निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने इस पहल को महाविद्यालय में संचालित देवभूमि उद्यमिता योजना की भावना के अनुरूप स्थानीय संसाधनों को उद्यमिता से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।

समाजशास्त्र विभाग से डॉ. सत्यमित्र सिंह एवं डॉ. नीम बोरा ने “मैगी हमारी नहीं थी, फिर पहाड़ की थाली मैगी कैसे बन गई?” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने स्थानीय खाद्य संस्कृति में आए बदलावों, वैश्वीकरण, बाजार के प्रभाव और बदलती खान-पान की आदतों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि स्थानीय भोजन केवल पोषण का साधन नहीं है, बल्कि यह समाज, संस्कृति, पहचान और स्थानीय अर्थव्यवस्था का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। बदलते दौर में जरूरत इस बात की है कि पारंपरिक खाद्य पदार्थों को आधुनिक बाजार की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित कर नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।

पारंपरिक व्यंजनों से सजी पहाड़ी थाली

कार्यक्रम के दौरान गृह विज्ञान विभाग की छात्राओं ने उत्तराखंड के पारंपरिक व्यंजन तैयार कर उनकी प्रस्तुति दी। इनमें मंडुवे की रोटी, झंगोरे की खीर, भट्ट की चुड़कानी, आलू के गुटके, गहत की दाल और भांग की चटनी प्रमुख रहे। विद्यार्थियों ने इन व्यंजनों के माध्यम से उत्तराखंड की समृद्ध खाद्य परंपरा के साथ-साथ इनके पोषण संबंधी महत्व को भी प्रदर्शित किया।

पारंपरिक व्यंजन प्रतियोगिता में प्रथम सेमेस्टर की अर्शिया ने प्रथम स्थान हासिल किया। बीए तृतीय सेमेस्टर की नीलम देवी ने द्वितीय स्थान प्राप्त किया, जबकि पंचम सेमेस्टर की शोभा एवं मेघा बिष्ट संयुक्त रूप से तृतीय स्थान पर रहीं। अंजली, बबीता (प्रथम सेमेस्टर) और गायत्री (तृतीय सेमेस्टर) को सांत्वना पुरस्कार प्रदान किया गया।

कार्यक्रम में डॉ. निष्ठा शर्मा, अर्पिता,  किशोर,  दिग्विजय भंडारी सहित महाविद्यालय के प्राध्यापक एवं कर्मचारी मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन गृह विज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. लोलिका अमित ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. नीतिका ने किया।

कार्यक्रम के समापन अवसर पर उपस्थित सभी लोगों ने “सप्ताह में एक दिन, एक स्थानीय अनाज” अपनाने का संकल्प लिया। इस पहल के माध्यम से स्थानीय अनाज और पारंपरिक खाद्य पदार्थों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें आधुनिक बाजार, उद्यमिता और वैश्विक पहचान से जोड़ने का संदेश दिया गया।

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