रानीखेत डिग्री कॉलेज में बना ‘ऑक्सीजन बैंक’, 100 पौधों से तैयार हो रहा सघन वन

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मियाबाकी विधि से 4-5 साल में तैयार होगा घना जंगल, पर्यावरणविद् डॉ. आशुतोष पंत ने स्कूलों-संस्थाओं को निशुल्क पौधे और तकनीकी सहायता देने की पहल की

रानीखेत डिग्री कॉलेज में बना ‘ऑक्सीजन बैंक’, 100 पौधों से तैयार हो रहा सघन वन

रानीखेत। पर्यावरण संरक्षण और हरित क्षेत्र बढ़ाने की दिशा में राजकीय डिग्री कॉलेज रानीखेत परिसर में वृहद पौधारोपण अभियान चलाया गया। कॉलेज परिसर में बड़ी संख्या में पौधे लगाए गए। इससे पहले जुलाई माह में भी महाविद्यालय में व्यापक स्तर पर वृक्षारोपण किया गया था। अब कॉलेज की खाली भूमि पर करीब 100 पेड़ों का सघन वन तैयार करने की दिशा में भी काम शुरू किया गया है।

पौधारोपण अभियान में एनसीसी कैडेट्स ने उत्साहपूर्वक भागीदारी करते हुए पौधे लगाने में सहयोग किया। कार्यक्रम में कॉलेज के शिक्षक डॉ. पीएन तिवारी, डॉ. प्राची जोशी, एनसीसी प्रभारी डॉ. लक्ष्मी, कॉलेज स्टाफ से श्री कृपाल और श्री उपाध्याय सहित पर्यावरणविद् डॉ. आशुतोष पंत के मित्र डॉ. जगदीश सती और वाहन चालक श्री ललित धारियाल ने सहभागिता की।

पर्यावरणविद् एवं पूर्व जिला आयुर्वेद अधिकारी डॉ. आशुतोष पंत ने महाविद्यालय के प्रधानाचार्य डॉ. पुष्पेश पांडे का आभार जताते हुए कहा कि उन्होंने कॉलेज परिसर के लिए पौधे उपलब्ध कराने और पौधारोपण में सहभागिता का अवसर दिया। उन्होंने कहा कि आज के समय में बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के बीच प्रत्येक व्यक्ति को अपने आसपास छोटे-छोटे ‘ऑक्सीजन बैंक’ तैयार करने की दिशा में प्रयास करना चाहिए।

मियाबाकी विधि से तैयार होगा घना जंगल

डॉ. पंत के अनुसार सघन वन तैयार करने की शुरुआत जापानी वैज्ञानिक डॉ. अकीरा मियाबाकी ने की थी। मियाबाकी पद्धति में पौधों को सामान्य वृक्षारोपण की तुलना में काफी कम दूरी पर लगाया जाता है। इससे पेड़ों के बीच प्रकाश और स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा होती है और पौधे तेजी से ऊपर की ओर बढ़ते हैं।

उन्होंने बताया कि सामान्य परिस्थितियों में जिस जंगल को तैयार होने में करीब 15 से 20 वर्ष लग सकते हैं, वहीं मियाबाकी पद्धति से लगाए गए पौधों से लगभग 4 से 5 वर्ष में अपेक्षाकृत घना वन क्षेत्र विकसित किया जा सकता है।

डॉ. पंत ने कहा कि जंगल की पहचान उसके पेड़ों के घनत्व से होती है। जब पेड़ इतने घने हो जाएं कि उनके बीच से गुजरना भी आसान न हो, तब एक वास्तविक सघन वन का स्वरूप सामने आता है। ऐसे क्षेत्रों में जैव विविधता को बढ़ावा मिलने के साथ पक्षियों, तितलियों और भौंरों सहित विभिन्न जीव-जंतुओं के लिए अनुकूल वातावरण तैयार होता है।

कम जमीन में भी तैयार हो सकता है सघन वन

डॉ. पंत ने बताया कि सघन वन तैयार करने के लिए बहुत अधिक भूमि की आवश्यकता नहीं होती। कम क्षेत्रफल में भी इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि अब तक उनके द्वारा 15 सघन वन तैयार किए जा चुके हैं, जिनमें से दो तो आधा बीघा से भी कम भूमि पर विकसित किए गए हैं।

उन्होंने स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संस्थाओं से भी अपने परिसर में सघन वन विकसित करने का आह्वान किया है। डॉ. पंत के अनुसार इच्छुक संस्थाओं को उनकी ओर से पौधे और तकनीकी सहायता निशुल्क उपलब्ध कराई जाएगी।

चारदीवारी और सिंचाई की व्यवस्था जरूरी

सघन वन तैयार करने के लिए उन्होंने कुछ जरूरी शर्तें भी बताईं। उन्होंने कहा कि जिस परिसर में पौधे लगाए जाएं, वह चारदीवारी से सुरक्षित होना चाहिए, ताकि पशु-पक्षियों अथवा अन्य कारणों से पौधों को नुकसान न पहुंचे। इसके अलावा शुरुआती दो वर्षों तक सिंचाई की व्यवस्था भी आवश्यक होगी।

उन्होंने उम्मीद जताई कि उचित देखभाल के बाद अगले 3 से 5 वर्षों में एक घना वन तैयार हो सकता है, जो न केवल पर्यावरण संरक्षण में योगदान देगा बल्कि संबंधित संस्थान के परिसर में पारिस्थितिकी का एक बेहतर मॉडल भी प्रस्तुत करेगा।

डॉ. पंत ने लोगों से अपील की कि केवल पौधे लगाने तक सीमित न रहें, बल्कि लगाए गए पौधों की नियमित देखभाल और संरक्षण की जिम्मेदारी भी निभाएं। उन्होंने कहा कि यदि हर स्कूल, कॉलेज और संस्था अपने परिसर में छोटे-छोटे सघन वन विकसित करे तो सामूहिक रूप से बड़े स्तर पर हरित क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर पर्यावरण तैयार किया जा सकता है।

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