छावनी परिषद द्वारा हिंदी पखवाड़ा अंतर्गत बुधवार की देर शाम यहां छावनी इंटर कॉलेज सभागार में कवि सम्मेलन का आयोजन।
रिपोर्ट– बलवन्त सिंह रावत
कवि सम्मेलन में हिंदी की महिमा से लेकर पहाड़ की पीड़ा, सामाजिक कुरीतियों और मानवीय संवेदनाओं तक गूंजे शब्द
रानीखेत। छावनी परिषद की ओर से हिंदी पखवाड़ा कार्यक्रमों की श्रृंखला के तहत बुधवार देर शाम छावनी इंटर कॉलेज के सभागार में भव्य कवि सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में क्षेत्र के कवि-कवयित्रियों ने समकालीन सामाजिक परिस्थितियों, मानवीय संवेदनाओं, जीवन के यथार्थ, हिंदी भाषा की महत्ता, पर्यावरण, पहाड़ की संस्कृति और सामाजिक विसंगतियों से जुड़े विषयों पर अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं। रचनाकारों की भावपूर्ण और विचारोत्तेजक प्रस्तुतियों ने सभागार में मौजूद श्रोताओं को कार्यक्रम के अंत तक बांधे रखा।
कवि सम्मेलन में ज्योति साह ने संघर्षपथ पर आगे बढ़ रही नई पीढ़ी का हौसला बढ़ाते हुए अपनी रचना के माध्यम से कर्म और नेतृत्व का संदेश दिया। उन्होंने कहा— “प्रगति के इस दिव्य रथ का, तू सारथी यदुराज बन जा…” उनकी पंक्तियों ने युवाओं को चुनौतियों के बीच आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
विमल सती ने अपनी रचना में आधुनिक समाज के भीतर मौजूद विकारों को रावण के दस सिर के प्रतीक के माध्यम से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि रावण के सिर भले ही आज दिखाई न देते हों, लेकिन मनुष्य के भीतर मौजूद अहंकार, लोभ और अन्य विकारों के रूप में वे अब भी जीवित हैं। उन्होंने पंक्तियां पढ़ीं— “कौन कहता है कि मर गया दशासन, आज भी जिंदा है चिर अट्टहास के साथ…” इसके साथ ही उन्होंने ‘मां का चूल्हा’ कविता के माध्यम से पारिवारिक संवेदनाओं को भी अभिव्यक्त किया।
दिनेश तिवारी ने अपनी कविता के माध्यम से इंसान को अपनी जड़ों और उन लोगों को याद रखने का संदेश दिया, जिनके सहयोग और स्नेह से वह जीवन में आगे बढ़ता है। उन्होंने कहा— “घर को जाते हुए मत भूलना उन दरख्तों को, जिनकी छांव में पले-बढ़े थे…”
देवकीनंदन कांडपाल ने कविराज पं. रामदत्त पंत को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अपनी रचना प्रस्तुत की। वहीं कृष्ण कुमार सती ने अपने अनोखे व्यक्तित्व और खास अंदाज से समाज में अलग पहचान बनाने वाले लोगों को रेखांकित करते हुए कहा— “खासमिजाज से जाने जाते हैं, दुनिया में ऐसे लोग कम हैं…”
हिंदी पखवाड़े के अवसर पर हिंदी भाषा की महत्ता भी कवि सम्मेलन में प्रमुखता से सामने आई। ललित मोहन तिवारी ने हिंदी के प्रति अपने भाव व्यक्त करते हुए कहा— “हिंदी तुझको शब्द समर्पण, कर न सका मैं तन मन अर्पण…” वहीं बाल कवि सृष्टि नेगी ने हिंदी को भारत की पहचान और शान बताते हुए अपनी कविता प्रस्तुत की— “हिंदी है भारत की शान, हर दिल की है यह पहचान…”
गीता जोशी ने रानीखेत के प्राकृतिक सौंदर्य को अपनी कविता में उतारते हुए कहा— “हवा में घुल गई जैसे कोई मीठी सी बात है…” उनकी रचना में रानीखेत की पहाड़ी वादियों और प्रकृति की सुंदरता की झलक देखने को मिली।
डॉ. विनीता खाती ने लेखन और अभिव्यक्ति की शक्ति को केंद्र में रखते हुए कहा— “अपने मन की लेखनी से कुछ शब्द उकेरना चाहती हूं…” वहीं उमा जोशी ने हिंदी की विशेषताओं का वर्णन करते हुए इसे सर्वगुण संपन्न भाषा बताया। उन्होंने कहा— “सर्वगुण संपन्न, संपूर्ण आहार, रसों का भंडार, छंदों का आधार, ऐसी है हिंदी…”
कवि सम्मेलन में जीवन के अकेलेपन और आध्यात्मिक पक्ष को भी रचनाओं में स्थान मिला। नेहा माहरा ने जीवन की कठिन परिस्थितियों में इंसान के अकेलेपन को अपनी कविता में व्यक्त करते हुए कहा— “जीवन के हर मोड़ पर इंसान अकेला क्यों रह जाता? परछाई भी साथ न देती…” वहीं राजेंद्र पंत ने पहाड़ की श्रमसाध्य महिलाओं के संघर्ष और उनके जीवन की कठिनाइयों को अपनी रचना के माध्यम से सामने रखा। उन्होंने कहा— “आज फिर उन्हें जिंदगी का बोझ सिर पर ढोते देखा है।”
इन विषयों पर भी हुई काव्य प्रस्तुतियां
कवि सम्मेलन में अन्य रचनाकारों ने भी विभिन्न विषयों को अपनी कविताओं का आधार बनाया। जयश्री साह ने ‘हमारा उत्तराखंड, हमारी शान’, इमराना परवीन ने चिट्ठी और मोबाइल के बदलते दौर के अंतर, गीता पवार ने भारत मां के वंदन, प्रीति पंत ने नेता की दुश्वारियों, सतीश चंद्र पांडे ने सेना के शौर्य, नरेश चंद्र ने सच से दूर होते समाज और मेघा जोशी ने कर्मपथ पर आगे बढ़ने का आह्वान करते हुए रचनाएं प्रस्तुत कीं।
इसी क्रम में कुणाल ने वर्षा ऋतु, आनंद अग्रवाल ने यातायात और पर्यावरण जैसे समसामयिक विषयों को कविता के माध्यम से सामने रखा। सीमा भाकुनी ने नज्म और अनिल अंश ने गजल प्रस्तुत कर कार्यक्रम में साहित्यिक रंग और गहरा कर दिया।
साहित्य और हिंदी के प्रति जागरूकता का संदेश
कवि सम्मेलन ने हिंदी पखवाड़े के उद्देश्य को भी प्रभावी रूप से सामने रखा। रचनाकारों ने अपनी कविताओं के जरिए हिंदी भाषा के प्रति सम्मान, सामाजिक सरोकारों के प्रति संवेदनशीलता और प्रकृति व पहाड़ की संस्कृति से जुड़ाव का संदेश दिया। हास्य, संवेदना, सामाजिक सरोकार और विचारों से सजी प्रस्तुतियों पर श्रोताओं ने तालियों से कवियों का उत्साहवर्धन किया।


